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Friday, January 1, 2016

Swadesh



This one is from the 2004 movie, Swades.


Setting: Mohan Bhargava (Shah Rukh Khan) goes to the commencement of the primary school in the village. After the ceremony gets over, the people of the village ask Mohan to share his experience of living in America. Mohan tells them about the infrastructure and amenities provided by the government.Suddenly Munishwar (a member of the village panchayat) says that India has something which makes it a better nation than America - its culture and traditions. To this Mohan replies,


Main nahi maanta ki humaara desh duniya ka sabse mahaon desh hai, lekin yeh zarror maanta hun ki hum mein kaabiliyat hai apne desh ko mahaan banane ki. Yeh dono desh ek doosre se har pehloo, har roop mein ek-doosre se alag hain... Jab bhi hum mukaable mein dabne lagte hain toh hum ek hi cheez ka aadhar lete hain - sanskaar, parampara. America ne apne bal-boote pe tarakki ki hai aur unke apne sanskaar hain, apni parampara hai. Ab yeh kehna ki unke soch-vichaar, unka rehan-sehan, unki manyataayein kharaab hain aur humaari mahaan, yeh galat hai.



(Translation: I don't agree that ours is the greatest country in the world, but I do believe that we have the potential and the strength to make it the greatest country in the world. Both these countries are very different from each other in every aspect... Whenever we suspect losing in a competition, we clutch onto our only refuge - our culture and traditions. America has progressed on its own strengths, and they have their own culture and own traditions. It would be wrong to claim that their culture, their traditions, their lifestyle and beliefs are inferior to ours.)


This dialogue gives a reality check to everyone who has been clinging onto our greatness from centuries ago, instead of working towards the betterment of the nation, and also ridiculing the western culture just because it is different from ours.

Friday, October 10, 2014

मुश्किल काम .........असगर वजाहत

मुश्किल काम .........असगर वजाहत

जब दंगे खत्म हो गये, चुनाव हो गये, जिन्हें जीतना था जीत गये, जिनकी सरकार बननी थी बन गयी, जिनके घर और जिनके जख्म भरने थे भर गये, तब दंगा करने वाली दो टीमों की एक इत्तफाकी मीटिंग हुई। मीटिंग की जगह आदर्श थी यानी शराब का ठेका- जिसे सिर्फ चंद साल पहले से ही 'मदिरालय` कहा जाने लगा था, वहां दोनों गिरोह जमा थे, पीने-पिलाने के दौरान किसी भी विषय पर बात हो सकती है, तो बातचीत ये होने लगी कि पिछले दंगों में किसने कितनी बहादुरी दिखाई, किसने कितना माल लूटा, कितने घरों में आग लगाई, कितने लोगों को मारा, कितने बम फोड़े, कितनी औरतों को कत्ल किया, कितने बच्चों की टाँगें चीरीं, कितने अजन्मे बच्चों का काम तमाम कर दिया, आदि-आदि।

मदिरालय में कभी कोई झूठ नहीं बोलता यानी वहां कही गयी बात अदालत में गीता या कुरान पर हाथ रखकर खायी गयी कसम के बराबर होती है, इसलिए यहां जो कुछ लिखा जा रहा है, सच है और सच के सिवा कुछ नहीं है। खैरियत खैरसल्ला पूछने के बाद बातचीत इस तरह शुरू हुई। पहले गिरोह के नेता ने कहा 'तुम लोग तो जन्खे हो, जन्खे. . .हमने सौ दुकानें फूंकी हैं।' दूसरे ने कहा, 'उसमें तुम्हारा कोई कमाल नहीं है। जिस दिन तुमने आग लगाई, उस दिन तेज हवा चल रही थी. . .आग तो हमने लगाई थी जिसमें तेरह आदमी जल मेरे थे।'

बात चूंकि आग में आदमियों पर आयी थी, इसलिए पहले ने कहा, 'तुम तेरह की बात करते हो? हमने छब्बीस आदमी मारे हैं।' दूसरा बोला, 'छब्बीस मत कहो।' 'क्यों?'

'तुमने जिन छब्बीस को मारा है. . .उनमें बारह तो औरतें थीं।' यह सुनकर पहला हंसा। उसने एक पव्वा हलक में उंडेल लिया और बोला, 'गधे, तुम समझते हो औरतों को मारना आसान है?' 'हां।'

'नहीं, ये गलत है।' पहला गरजा। 'कैसे?'

'औरतों की हत्या करने के पहले उनके साथ बलात्कार करना पड़ता है, फिर उनके गुप्तांगों को फाड़ना-काटना पड़ता है. . .तब कहीं जाकर उनकी हत्या की जाती है।' 'लेकिन वे होती कमजोर हैं।'

'तुम नहीं जानते औरतें कितनी जोर से चीखती हैं. . .और किस तरह हाथ-पैर चलाती हैं. . .उस वक्त उनके शरीर में पता नहीं कहां से ताकत आ जाती है. . .' 'खैर छोड़ो, हमने कुल बाइस मारे हैं. . .आग में जलाये इसके अलावा हैं।' दूसरा बोला। पहले ने पूछा, 'बाईस में बूढे कितने थे?'

'झूठ नहीं बोलता. . .सिर्फ आठ थे।' 'बूढ़ों को मारना तो बहुत ही आसान है. . .उन्हें क्यों गिनते हो?' 'तो क्या तुम दो बूढ़ों को एक जवान के बराबर भी न गिनोगे?'

'चलो, चार बूढ़ों को एक जवान के बराबर गिन लूंगा।' 'ये तो अंधेर कर रहे हो।' 'अबे अंधेर तू कर रहा है. . .हमने छब्बीस आदमी मारे हैं. . .और तू हमारी बराबरी कर रहा है।'

दूसरा चिढ़ गया, बोला, 'तो अब तू जबान ही खुलवाना चाहता है क्या?' 'हां-हां, बोल बे. . .तुझे किसने रोका है।' 'तो कह दूं सबके सामने साफ-साफ?' 'हां. . .हां, कह दो।'

'तुमने जिन छब्बीस आदमियों को मारा है. . .उनमें ग्यारह तो रिक्शे वाले, झल्ली वाले और मजदूर थे, उनको मारना कौन-सी बहादुरी है?' 'तूने कभी रिक्शेवालों, मजदूरों को मारा है?' 'नहीं. . .मैंने कभी नहीं मारा।' वह झूठ बोला। 'अबे, तूने रिक्शे वालों, झल्ली वालों और मजदूरों को मारा होता तो ऐसा कभी न कहता।'

'क्यों?'
'पहले वे हाथ-पैर जोड़ते हैं. . .कहते हैं, बाबूजी, हमें क्यों मारते हो. . हम तो हिंदू हैं न मुसलमान. . .न हम वोट देंगे. . .न चुनाव में खड़े होंगे. . .न हम गद्दी पर बैठेंगे. . .न हम राज करेंगे. . .लेकिन बाद में जब उन्हें लग जाता है कि वो बच नहीं पायेंगे तो एक-आध को ज़ख्म़ी करके ही मरते हैं।'

दूसरे ने कहा, 'अरे, ये सब छोड़ो. . .हमने जो बाईस आदमी मारे हैं. . .उनमें दस जवान थे. . कड़ियल जवान. . . '

'जवानों को मारना सबसे आसान है।' 'कैसे? ये तुम कमाल की बात कर रहे हो!' 'सुनो. . .जवान जोश में आकर बाहर निकल आते हैं उनके सामने एक-दो नहीं पचासों आदमी होते हैं. . .हथियारों से लैस. . .एक आदमी पचास से कैसे लड़ सकता है?. . .आसानी से मारा जाता है।'

इसके बाद 'मदिरालय` में सन्नाटा छा गया, दोनों चुप हो गये। उन्होंने कुछ और पी, कुछ और खाया, कुछ बहके, फिर उन्हें धयान आया कि उनका तो आपस में कम्पटीशन चल रहा था।

पहले ने कहा, 'तुम चाहो जो कहो. . .हमने छब्बीस आदमी मारे हैं. . .और तुमने बाईस. . .' 'नहीं, यह गलत है. . .तुमने हमसे ज्यादा नहीं मारे।' दूसरा बोला। 'क्या उल्टी-सीधी बातें कर रहे हो. . .हम चार नंबरों से तुमसे आगे हैं।'

दूसरे ने ट्रम्प का पत्ता चला, 'तुम्हारे छब्बीस में बच्चे कितने थे?' 'आठ थे।' 'बस, हो गयी बात बराबर।' 'कैसे?'

'अरे, बच्चों को मारना तो बहुत आसान है, जैसे मच्छरों को मारना।' 'नहीं बेटा, नहीं. . .ये बात नहीं है. . . तुम अनाड़ी हो।' दूसरा ठहाका लगाकर बोला, 'अच्छा तो बच्चों को मारना बहुत कठिन है?' 'हां।'

'कैसे?' 'बस, है।' 'बताओ न . . '

'बताया तो. . .' 'क्या बताया?'

'यही कि बच्चों को मारना बहुत मुश्किल है. . .उनको मारना जवानों को मारने से भी मुश्किल है. . .औरतों को मारने से क्या, मजदूरों को मारने से भी मुश्किल।'

'लेकिन क्यों?' 'इसलिए कि बच्चों को मारते वक्त. . .'

'हां। . .हां, बोलो रुक क्यों गये?' 'बच्चों को मारते समय. . .अपने बच्चे याद आ जाते हैं।'

असगर वजाहत


Friday, September 26, 2014

Love


बहुत समय पहले की बात है , एक वृद्ध सन्यासी हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहता था. वह बड़ा ज्ञानी था और उसकी बुद्धिमत्ता की ख्याति दूर -दूर तक फैली थी. एक दिन एक औरत उसके पास पहुंची और अपना दुखड़ा रोने लगी , ” बाबा, मेरा पति मुझसे बहुत प्रेम करता था , लेकिन वह जबसे युद्ध से लौटा है ठीक से बात तक नहीं करता .”
...
” युद्ध लोगों के साथ ऐसा ही करता है.” , सन्यासी बोला.

” लोग कहते हैं कि आपकी दी हुई जड़ी-बूटी इंसान में फिर से प्रेम उत्पन्न कर सकती है , कृपया आप मुझे वो जड़ी-बूटी दे दें.” , महिला ने विनती की.

सन्यासी ने कुछ सोचा और फिर बोला ,” देवी मैं तुम्हे वह जड़ी-बूटी ज़रूर दे देता लेकिन उसे बनाने के लिए एक ऐसी चीज चाहिए जो मेरे पास नहीं है .”

” आपको क्या चाहिए मुझे बताइए मैं लेकर आउंगी .”, महिला बोली.

” मुझे बाघ की मूंछ का एक बाल चाहिए .”, सन्यासी बोला.

अगले ही दिन महिला बाघ की तलाश में जंगल में निकल पड़ी , बहुत खोजने के बाद उसे नदी के किनारे एक बाघ दिखा , बाघ उसे देखते ही दहाड़ा , महिला सहम गयी और तेजी से वापस चली गयी.

अगले कुछ दिनों तक यही हुआ , महिला हिम्मत कर के उस बाघ के पास पहुँचती और डर कर वापस चली जाती. महीना बीतते-बीतते बाघ को महिला की मौजूदगी की आदत पड़ गयी, और अब वह उसे देख कर सामान्य ही रहता. अब तो महिला बाघ के लिए मांस भी लाने लगी , और बाघ बड़े चाव से उसे खाता. उनकी दोस्ती बढ़ने लाफि और अब महिला बाघ को थपथपाने भी लगी. और देखते देखते एक दिन वो भी आ गया जब उसने हिम्मत दिखाते हुए बाघ की मूंछ का एक बाल भी निकाल लिया.

फिर क्या था , वह बिना देरी किये सन्यासी के पास पहुंची , और बोली
” मैं बाल ले आई बाबा .”

“बहुत अच्छे .” और ऐसा कहते हुए सन्यासी ने बाल को जलती हुई आग में फ़ेंक दिया

” अरे ये क्या बाबा , आप नहीं जानते इस बाल को लाने के लिए मैंने कितने प्रयत्न किये और आपने इसे जला दिया ……अब मेरी जड़ी-बूटी कैसे बनेगी ?” महिला घबराते हुए बोली.

” अब तुम्हे किसी जड़ी-बूटी की ज़रुरत नहीं है .” सन्यासी बोला . ” जरा सोचो , तुमने बाघ को किस तरह अपने वश में किया….जब एक हिंसक पशु को धैर्य और प्रेम से जीता जा सकता है तो क्या एक इंसान को नहीं ? जाओ जिस तरह तुमने बाघ को अपना मित्र बना लिया उसी तरह अपने पति के अन्दर प्रेम भाव जागृत करो.”

महिला सन्यासी की बात समझ गयी , अब उसे उसकी जड़ी-बूटी मिल चुकी थी

Friday, August 22, 2014

Self Appraisal


A Little boy went to a telephone booth which was at the cash counter of a store and dialed a number. The store-owner observed and listened to the conversation:

Boy: “Lady, can you give me the job of cutting your lawn?”

Woman: (at the other end of the phone line) “I already have someone to cut my lawn.”

Boy: “Lady, I will cut your lawn for half the price than the person who cuts your lawn now.”

Woman: “I’m very satisfied with the person who is presently cutting the lawn.”

Boy: (with more perseverance) “Lady, I’ll even sweep the floor and the stairs of your house for free.”

Woman: “No, thank you.”

With a smile on his face, the little boy replaced the receiver. The store-owner, who was listening to all this, walked over to the boy.

Store-owner: “Son….I like your attitude; I like that positive spirit and would like to offer you a job.”

Boy: “No thanks.”

Store-owner: “But you were really pleading for one.”

Boy: “No Sir, I was just checking my performance at the job I already have. I am the one who is working for that lady I was talking to!”

*”This is called Self Appraisal”

Give your best and the world comes to you !!!