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Friday, October 24, 2014

कहीं चांद राहों में खो गया कहीं चांदनी भी भटक गई


कहीं चांद राहों में खो गया कहीं चांदनी भी भटक गई
मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई

मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव में
मेरे साथ था तुझे जागना तेरी आँख कैसे झपक गई

कभी हम मिले तो भी क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले
न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई

मुझे पदने वाला पढ़े भी क्या मुझे लिखने वाला लिखे भी क्या
जहाँ नाम मेरा लिखा गया वहां रोशनाई उलट गई

तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी क़ामयाब न हो सकीं
 तेरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई,,,,,,,,




------------------Anjaan

Friday, October 17, 2014

Firkabandi hai kahi aur kahi jaten hai,


Firkabandi hai kahi aur kahi jaten hai,
Kya zamane me panpne ki yahi bate hai."

"yu saiyad bhi ho,mirza bhi ho,afgan bhi ho,
Tum sabhi kuchh ho,ye batayo kya tum musalma bhi ho

Friday, October 3, 2014

कोई जुगनू न आया खेलता-हँसता अंधेरे में,



कोई जुगनू न आया खेलता-हँसता अंधेरे में,
मैं कितनी देर तक बैठा रहा तन्हा अंधेरे में।

तुम्हारे साथ क्यों सुलगी तुम्हारे घर की दीवारें,
बुझा दो रोशनी कि सोचते रहना अंधेरे में।

अगर अंदर की थोड़ी रोशनी बाहर न आ जाती,
मैं अपने आप से टकरा गया होता अंधेरे में।

अगर खुद जल गया होता तो शायद सुबह हो जाती, 
मैं सूरज की दुआ क्यों माँगने बैठा अंधेरे में।




--------------------------Anjaan

Friday, September 19, 2014

हवस के सारे पुजारी ने नाक रख ली है


हवस के सारे पुजारी ने नाक रख ली है/
जला के पास की बस्ती नक़ाब रख ली है/

सुबह वो फिर से दिखा साफ़ से लिबासों में/
छुपा के जैसे किसी नें शराब रख ली है/

जहाँ में ख़ुद ही मचाता है शोर हाकिम सा/
ख़मोश मजमें में ख़ुद से ख़िताब रख ली है/

ख़ुदा ही जाने ये कबकी निभाई है हमसे/
ख़ुदी से जाल बुना और हिसाब रख ली है/

ज़माने भर के जो सबसे अज़ीम जाहिल थे/
फ़क़त दिखावे के ख़ातिर किताब रख ली है/.....
====================
-सलमान रिज़वी-

Friday, September 12, 2014

सीधा साधा डाकिया जादू करे महान


सीधा साधा डाकिया जादू करे महान
एक ही थैली में भरे आंसू और मुस्कान ॥

घर को खोजे रात दिन घर से निकले पाँव
वो रास्ता ही खो गया जिस रास्ते था गाँव॥

मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दिल ने दिल से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार॥

बच्चा बोला देखके मस्जिद आलिशान
अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान॥

निदा फाजली

Friday, September 5, 2014

दोस्ती जब किसी से की जाये|


दोस्ती जब किसी से की जाये|
दुश्मनों की भी राय ली जाये|

मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में,
अब कहाँ जा के साँस ली जाये|

बस इसी सोच में हूँ डूबा हुआ,
ये नदी कैसे पार की जाये|

मेरे माज़ी के ज़ख़्म भरने लगे,
आज फिर कोई भूल की जाये|

बोतलें खोल के तो पी बरसों,
आज दिल खोल के भी पी जाये| 

Rahat indori

Friday, August 29, 2014

हऱ शख्‍़स के चेहरे का भरम खोल रहा है


हऱ शख्‍़स के चेहरे का भरम खोल रहा है
कम्‍बख्‍़त यह आईना है सच बोल रहा है

खुशबू है कि आँधी है यह मालूम तो कर ले
आहट पे ही दरवाज़े को क्‍यूँ खोल रहा है

तू बोल रहा है किसी मज़लूम के हक़ में
इतनी दबी आवाज़ में क्‍यों बोल रहा है

पैरों को ज़मीं जिसके नहीं छोड़ती वो भी
पर अपने उड़ाने के लिए तोल रहा है

पहले उसे ईमान कहा करते थे शायद
अब आदमी सिक्‍कों में जिसे तोल रहा
-------------------Anjaan

Friday, August 15, 2014

रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या है


रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या है
दिल ही शोला है तो ये सोज़-ए-मोहब्बत क्या है
वो मुझे भूल गई इसकी शिकायत क्या है
रंज तो ये है के रो-रो के भुलाया होगा
Kaifi azmi

Friday, August 8, 2014

डर मुझे भी लगा फ़ासला देखकर,

डर मुझे भी लगा फ़ासला देखकर,
पर में बढ़ता गया रास्ता देखकर.

ख़ुद ब ख़ुद मेरे नज़दीक आती गई,
मेरी मंज़िल मेरा हौसला देखकर.

मैं परिंदों की हिम्मत पे हैरान हूँ,
एक पिंजरे को उड़ता हुआ देखकर.

खुश नहीं हैं अॅाधेरे मेरे सोच में,
एक दीपक को जलता हुआ देखकर.

डर सा लगने लगा है मुझे आजकल,
अपनी बस्ती की आबो- हवा देखकर.

किसको फ़ुर्सत है मेरी कहानी सुने,
लौट जाते हैं सब आगरा देखकर.


--------------------अशोक रावत 

Friday, May 30, 2014

रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या है


रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या है
दिल ही शोला है तो ये सोज़-ए-मोहब्बत क्या है
वो मुझे भूल गई इसकी शिकायत क्या है
रंज तो ये है के रो-रो के भुलाया होगा
Kaifi azmi

Friday, May 23, 2014

जुल्‍म फिर ज़ुल्‍म है, बढ़ता है तो मिट जाता है


जुल्‍म फिर ज़ुल्‍म है, बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
तुमने जिस ख़ून को मक़्तल में दबाना चाहा
आज वह कूचा-ओ-बाज़ार में आ निकला

जिस्‍म मिट जाने से इन्‍सान नहीं मर जाते
धड़कनें रूकने से अरमान नहीं मर जाते
सॉंस थम जाने से ऐलान नहीं मर जाते
होंठ जम जाने से फ़रमान नहीं मर जाते

जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती
ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ले आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मशरिक में हो कि मग़रिब में

अमने आलम का ख़ून है आख़िर
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूहे- तामीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें या औरों के

ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है
टैंक आगे बढें कि पीछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
फ़तह का जश्न हो कि हार का सोग
जिंदगी मय्यतों पे रोती है

इसलिए ऐ शरीफ इंसानों
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है।

साहिर लुधियानवी

Friday, May 16, 2014

गाली सी चुभती है औकात की बात


गाली सी चुभती है औकात की बात

दिल दिमाग सब बाद की बात
चलो करते है पेट और खुराक की बात

मेरा ऊंचाइयो से मतलब था
तुम करने लगे जिराफ की बात

कोई रहनुमा कोई फरिश्ता कोई खुदा
ये तो अपने-अपने नकाब की बात

मुल्क में अमन था, चैन था, मोहब्बत थी
फिर उठा दी किसी ने जात की बात

तुम ओहदा कह लो हैसियत कह लो
गाली सी चुभती है औकात की बात

वो बेशक न सुने बूढ़े बाप की अपने
पर टालता नहीं कभी औलाद की बात

घर होगा, बिजली, राशन, पानी होगा
नेताजी, खूब करते हो मजाक की बात

‘प्रदीप’ ये है अन्धो की बस्ती
कोई सुनता नहीं चिराग की बात – प्रदीप तिवारी

Friday, May 9, 2014

खूबसूरत हैं आँखें तेरी रात को जागना छोड़ दे


खूबसूरत हैं आँखें तेरी रात को जागना छोड़ दे
खुद ब खुद नींद आ जायेगी, तू मुझे सोचना छोड़ दे॥


कोई बच्चा तड़पता है तो माँ का दम निकलता है
मगर जब माँ तड़पती है तो फिर जम जम निकलता है॥

हसन काज़मी

Friday, March 28, 2014

गाँव लौटे शहर से तो सादगी अच्छी लगी

गाँव लौटे शहर से तो सादगी अच्छी लगी

हमको मिट्टी के दिये की रौशनी अच्छी लगी

बांसी रोटी सेक कर जब नाश्ते में माँ ने दी

हर अमीरी से हमें ये मुफ़लिसी अच्छी लगी

दे न पाई बाल बच्चों को जो रोटी क्या हुआ

सुनने वालों को तो मेरी शायरी अच्छी लगी

हसन काज़मी

Friday, March 21, 2014

मैं तेरी आँख में आँसू कि तरह रहता हूँ

मैं तेरी आँख में आँसू कि तरह रहता हूँ

जलते बुझते हुए जुगनू कि तरह रहता हूँ

सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं

मैं भी इस मुल्क़ में उर्दू की तरह रहता

Friday, October 25, 2013

Main uski khamoshi ka sabab poochti rahi,

Main uski khamoshi ka sabab poochti rahi,
Woh kisse idhar udhar ke suna kar chala gaya ... !!



Badi Tabdilyan laayen hum apne aap me
Lekin
Teri yaad me rahne ki aadat ab bhi baki hai

Friday, August 23, 2013

Umar RajiAllaahu Ta'ala Anhu


عمر فاروق رضی اللہ تعالی عنہ ایک انصاف پسند حاکم تھے۔ وہ ایک مرتبہ وہ مسجد میں منبر رسول پر کھڑے خطبہ دے رہے تھے کہ ایک غریب شخص کھڑا ہوگیا اور کہا کہ اے عمر ہم تیرا خطبہ اس وقت تک ہیں سنیں گے جب تک یہ نہ بتا گے کہ یہ جو تم نے کپڑا پہنا ہوا ہے وہ زیادہ ہے جبکہ بیت المال سے جو کپڑا ملا تھا وہ اس سے بہت کم تھا۔تو عمر فاروق رضی اللہ تعالی عنہ نے کہا کہ مجمع میں میرا بیٹا عبداللہ موجود ہے، عبداللہ بن عمر کھڑے ہوگئے۔

عمر فاروق رضی اللہ تعالی عنہ نے کہا کہ بیٹا بتا کہ تیرا باپ یہ کپڑا کہاں سے لایا ہے ورنہ قسم ہے اس ذات کی جس کے قبضہ میں میری جان ہے میں قیامت تک اس منبر پر نہیں چڑھوں گا۔ حضرت عبداللہ رضی اللہ تعالی عنہ نے بتایا کہ بابا کو جو کپڑا ملا تھا وہ بہت ہی کم تھا اس سے ان کا پورا کپڑا نہیں بن سکتا تھا۔ اور ان کے پاس جو پہننے کے لباس تھا وہ بہت خستہ حال ہو چکا تھا۔ اس لئے میں نے اپنا کپڑا اپنے والد کو دے دیا۔ ابن سعد فرماتے ہیں کہ ہم لوگ ایک دن حضرت امیر الممنین رضی اللہ عنہ کے دروازے پن بیٹھے ہوئے تھے کہ ایک کنیز گزری ۔ بعض کہنے لگے یہ باندی حضرت کی ہے۔

آ پ (حضرت عمر رضی اللہ تعالی عنہ) نے فرمایا کہ امیر الممنین کو کیا حق ہے وہ خدا کے مال میں سے باندی رکھے۔ میرے لیئے صرف دو جوڑے کپڑے ایک گرمی کا اور دوسرا جھاڑے کا اور اوسط درجے کا کھانا بیت المال سے لینا جائز ہے۔ باقی میری وہی حیثیت ہے جو ایک عام مسلمان کی ہے۔ جب آپ کسی بزرگ کو عامل بنا کر بھیجتے تھے تو یہ شرائط سنا دیتے تھے : 1- گھوڑے پر کبھی مت سوار ہونا۔ 2- عمدہ کھانا نہ کھانا۔ 3- باریک کپڑا نہ پہننا۔ 4- حاجت مندوں کی داد رسی کرنا۔

Friday, June 28, 2013

कुछ दूर हमारे साथ चलो, हम दिल कि कहानी कह देंगे,

कुछ दूर हमारे साथ चलो, हम दिल कि कहानी कह देंगे,
समझे न जिसे तुम आंखों से, वो बात ज़बानी कह देंगे |

जो प्यार करेंगे, जानेंगे, हर बात हमारी मानेंगे,
जो खुद न जले हों उल्फत में, वो आग को पानी कह देंगे |
...
जब प्यास जवान हो जायेगी, एहसास की मंजिल पायेगी,
खामोश रहेंगे और तुम्हें, हम अपनी कहानी कह देंगे |

इस दिल में ज़रा तुम बैठो तो, कुछ हाल हमारा पूछो तो ,
हम सादा दिल हैं मगर, हर बात पुरानी कह देंगे |

Friday, April 26, 2013

Ae Khuda Aaj Ye Faisla Karde,



Ae Khuda Aaj Ye Faisla Karde,
Use Mera ya Mujhe Uska Karde..

Bahut Dukh Sahe Hai Maine,
Koi Khushi Ab To Mukaddar Karde..

Bahut Muskil Lagta Hai Usse Dur Rehna,
Judai Ke Safar Ko Kum Karde..

Jitna Dur Chale Gaye Wo Mujhse,
Use Utna Kareeb Karde..

Nahi Likha Agar Naseeb Me Uska Naam,
To Khatam Kar Ye Zindagi aur Mujhe FANAA Karde....!

-----------------Anjaan

Friday, April 5, 2013

Koi gazal sunakar kya karna, youn baatain banakar kya karna



Koi gazal sunakar kya karna, youn baatain banakar kya karna,
Tum mere the tum mere ho, ye 'tumko' aur duniya ko batakar kya karna,

Tum ehad nibhao chahat se, koi rasham nibhakar kya karna,
Tum khafa bhi achchi lagti ho, fir tumko manakar kya karna,

Tere dar par aake baithe hain, ab ghar bhi jaakar kya karna,
In yaad se achcha guzrega din, phir tumko bhulakar kya karna...!


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Ajeeb tamasha bana rakha hai, yahan mitti se bane logo ne
Bewafai karo to rote hain, Aur agar wafa karo to bahut rulate hain.

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Main jiske hath me phool deker aaya tha
Usi ke hath ka pathar meri talash me hai.